शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

जल सत्‍याग्रह कर रहे हैं नर्मदा बचाओं आंदोलनकारी

          बार-बार नर्मदा बचाओ आंदोलनकारी हर साल बारिश के मौसम में जल सत्‍याग्रह पर बैठ जाते हैं। सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। ऐसे आंदोलन नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेघा पाटकर के नेतृत्‍व में राज्‍य में कई बार हुए। अब मेघा पाटकर ने इस आंदोलन से अपने आपको दूर कर लिया है और उनके समर्थक अब आंदोलन का नेतृत्‍व कर रहे हैं। पिछले एक सप्‍ताह से खंडवा के आसपास ग्रामीण जन जल सत्‍याग्रह पर बैठे हैं और उन्‍हें हर पल मौत सता रही है। फिर भी अधिकारी कोई भी चर्चा करने को तैयार नहीं है। इंदिरा सागर परियोजना को साकार करने में जिन्‍होंने अपना अमूल योगदान देकर अपनी जन्‍म भूमि छोड़ दी उन पर एक बार फिर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जब तक इंदिरा सागर परियोजना का 262 मीटर तक भरने के आदेश नहीं हुए थे, तब लोग निश्‍‍चिंत होकर मुआवजा लेकर गुजर-बसर कर रहे थे, लेकिन जैसे ही हाईकोर्ट द्वारा 262 मीटर भरने के आदेश हुए और उसी के साथ ही गांव-गांव में पानी कहर बनकर सामने आया है। पानी रहवासियों के घरों में घुसने लगा है। इसको लेकर अब विस्‍थापितों ने गले-गले पानी में डूबकर अपना आंदोलन शुरू कर दिया है। इसी के साथ ही आंदोलनकारियों ने एलान कर दिया है कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गई तो वह डूब कर मौत को गले लगा लेंगे। फिलहाल तो इन आंदोलनकारियों के बारे में कोई विचार विमर्श नहीं हो रहा है और विस्‍थापित अपने आंदोलन में अडिग हैं।
''नृत्‍य से तनमन हुआ झंकृत''

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

आदिवासी नेताओं ने स्‍वीकारा : मप्र में लड़कियों की तस्‍करी

           आदिवासी वर्ग की उपेक्षा और रोजगार के अभाव में लड़कियों की तस्‍करी के मामले जब तब सामने आते रहे हैं। विशेषकर आदिवासी अंचलों से युवा आदिवासी लड़कियों को बहला-फुसलाकर और सपनों के जाल में फंसा कर महानगर में बेचने के मामले कई बार सामने आये हैं फिर भी आदिवासी नेताओं ने इस मामले में चुप्‍पी ही साध रखी है। पहली बार 29 अगस्‍त, 2012 को मप्र आदिवासी विकास परिषद के सम्‍मेलन में इस बात पर नाराजगी जाहिर की गई कि आदिवासी युवतियों की तस्‍करी हो रही है और आदिवासी समाज एवं नेता चुप बैठे हुए हैं। 
           मप्र में आदिवासी बाहुल्‍य इलाकों में तस्‍करों का एक गिरोह काम कर रहा है, जो कि अलग-अलग सपने दिखकर आदिवासी बालाओं को महानगरों में लेकर जाकर बेच रहे हैं। यह आरोप कोई विपक्षी दल का नेता नहीं लगा रहा है, बल्कि मप्र की पुलिस ने समय-समय पर ऐसे गिरोह को पकड़ा है, जिनके पास से आदिवासी लड़कियां बरामद हुई हैं। यह सिलसिला 1990 के दशक से चल रहा है, जो‍ कि वर्ष 2003 से लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस दिशा में राज्‍य सरकार ने समय-समय पर कदम भी उठाएं, पुलिस को सक्रिय भी किया और कुछ गिरोह पकड़ में भी आये, इसके बाद भी आदिवासी बालाओं को महानगरों में बेचने का सिलसिला थमा नहीं है। हाल ही में पिछले साल डिंडोरी और अनूपपुर में तो आदिवासी बालाओं को को रेलवे स्‍टेशन से पुलिस ने गिरोह के साथ पकड़ा था, लेकिन पुलिस इस बात की तफतीश नहीं कर पाई कि आखिरकार आदिवासी बालाएं बेचने के पीछे कौन सा गिरोह काम कर रहा है। ऐसा कहा जाता है कि देश के महानगर दिल्‍ली, मुंबई, कोलकत्‍ता एवं हैदराबाद में काम करने वाली बाईयों की संख्‍या लगातार कम हो रही है, इनकी पूर्ति करने के लिए आदिवासी बालाओं को बेचने का गिरोह काम कर रहा है। इसमें ऐसा गिरोह भी जो कि आदिवासी बालाओं को पहले महानगरों में देह व्‍यापार कराता है उसके बाद उन्‍हें घरेलू काम में लगा दिया जाता है। इस गंभीर समस्‍या की ओर लंबे समय बाद आदिवासी विकास परिषद के सम्‍मेलन में विचार किया गया। आदिवासी नेताओं ने स्‍वीकार किया कि आदिवासी बाहुल्‍य क्षेत्र में मानव तस्‍करी से जुड़े गिरोह संगठित हैं, जिनके तार मुंबई, कोलकत्‍ता आदि महानगरों में ऑपरेट कर रहे अंतर्राज्‍यीय गिरोह से जुड़े हुए हैं। इस बैठक की अध्‍यक्षता आदिवासी नेता और सांसद कांतिलाल भूरिया ने की और उनके साथ विधायक विसाहूलाल सिंह, सांसद बसूरीराम मरकाम, विधायक उमंग सिंघार, धरमू सिंह, नारायण सिंह पट्टा एवं श्रीमती सुलोचना रावत सहित आदि मौजूद थी। अब देखना यह है कि इस गंभीर समस्‍या पर आदिवासी नेता भविष्‍य में क्‍या करते हैं। 
मौसम हुआ सुहाना - भोपाल के मौसम की झलक........

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

खत्‍म हो रहा है मप्र में बाघों का कुनवा

 
          कभी हम मध्‍यप्रदेशवासी बाघ स्‍टेट पर गौरव किया करते थे, लेकिन अब बाघों का कुनवा धीरे-धीरे खत्‍म हो रहा है। यहां भी माफिया ने अपने पैर जमा लिये हैं जिसके फलस्‍वरूप धीरे-धीरे जंगलों से बाघों को निशाना बनाकर खत्‍म किया जा रहा है। पिछले दस साल में मप्र में 24 बाघ और 99 पेंथर का शिकार हुआ है। इसके बाद भी वन विभाग की नींद नहीं खुली है। न तो शिकारियों पर कोई कार्यवाही हुई हैं और न ही बाघों को बचाने के लिए कोई मुहिम शुरू हो पाई है। आलम यह हो गया है कि बाघो की गणना को लेकर भी मप्र में बढ़ा विवाद घिर गया है। इसी गणना के चलते कहा गया कि मप्र में बाघों की संख्‍या वर्ष 2004 में 713 हो गई है पर केंद्र सरकार की रिपोर्ट में इस पर पानी फेरते हुए मप्र में वर्ष 2005 में बाघों की संख्‍या 390 बताई गई है। इस रिपोर्ट से साफ जाहिर हो गया कि शेष 323 बाघ कहा चले गये। इससे साफ जाहिर है कि बाघों को लेकर एक बड़ा गिरोह मप्र में काम कर रहा है जिसका चक्रव्‍यूह तोड़ने के लिए राज्‍य सरकार किसी भी स्‍तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कर रही है। 
        मप्र में 9 नेशनल पार्क और 25 अभ्‍यारण्‍य हैं। इन अभ्‍यारण्‍यों के लिए केंद्र औ राज्‍य सरकार करीब 40 करोड़ से अधिक का फंड वन्‍य प्राणियों की सुरक्षा के लिए मुहैया करा रही है। इसके बाद भी वन्‍यप्राणियों की संख्‍या लगातार घट रही है। चौंकाने वाले तथ्‍य तो यह है कि वन्‍य अभ्‍यारण्‍यों में भी शिकारी पहुंच गये हैं, जो कि बाघों का शिकार करने की कला में ऐसे माहिर है कि वे शिकार भी कर रहे हैं और उसके प्रमाण भी नहीं छोड़ रहे हैं। एक अन्‍य रिपोर्ट के अनुसार 1989 से 2010 के बीच 13 बाघों का शिकार हुआ और वर्ष 2012 में बढ़कर इसकी संख्‍या 24 हो गई। अभ्‍यारण्‍यों को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर पर्यटकों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। यह याचिका प्रयत्‍न संस्‍था के अजय दुबे ने लगाई है। इसके चलते मप्र समेत पूरे देश के अभ्‍यारण्‍यों पर पर्यटकों की आवाजाही पर रोक लग गई है। इस मामले को लेकर मप्र के सीएम ने आपत्ति जाहिर की है, तो केंद्र सरकार ने भी उच्‍चतम न्‍यायालय में आवेदन लगाकर अभ्‍यारण्‍यों में पर्यटकों पर रोक लगाने पर नाराजगी जाहिर की है। अब अदालत को तय करना है कि अभ्‍यारण्‍य में पयर्टक प्रवेश कर पायेंगे या नहीं। फिलहाल तो वन विभाग ने रोक लगा दी है। इससे पर्यटन व्‍यवसाय प्रभावित होने की बाते कहीं जा रही है। इससे भी हटकर बाघों के बचाने पर जितना जोर राज्‍य सरकार को देना चाहिए उस दिशा में प्रयास नहीं हो रहे हैं। इससे हम मप्र वासी टाइगर स्‍टेट का जो तमंगा लगाये घूम रहे हैं वह हमसे छिनता जा रहा है, जो कि बेहद चिंता का विषय है। इस दिशा में सरकार और विपक्ष को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

बुधवार, 22 अगस्त 2012

तूफानी बारिश के बाद बांधों के प्राकृतिक नजारे

     मध्‍यप्रदेश प्रकृति की गोद में समाया हुआ है। प्राकृतिक सौंदर्यता कदम-कदम पर है। जहां नजर चली जाये, वहां खूबसूरती ही खूबसूरती नजर आती है। प्रकृति ने भरपूर आसरा राज्‍य को दिया है जिसके चलते प्राकृतिक खूबसूरती का खजाना जहां तहां भरा पड़ा है। पिछले एक सप्‍ताह से लगातार हो रही बारिश ने तो प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लगा दिये हैं। तूफानी बारिश ने राज्‍य के हर हिस्‍से में बांधों को लबालब पानी से भर दिया है और अब बांधों के गेट खुलने का सिलसिला चल पड़ा है। भोपाल संभाग के अधिकांश बांधों के गेट खोले जा रहे हैं, जो कि प्रकृति की सुंदरता की अलग ही छटा बिखेर रहे हैं। 
       वर्ष 2006 के बाद 2012 के 21 अगस्‍त को भदभदा का एक गेट खोला गया और बड़ी झील झलक पड़ी। सात सालों में भदभदा का गेट खोला गया है इसको देखने के लिए पूरे राजधानी के वाशिंदे उमड़ पड़े जिसके चलते जगह-जगह जाम की स्थिति बनी। शहर में भदभदा के गेट देखना यानि एक उत्‍सह बन गया है। इसी तरह बारना गेट भी खोले गये हैं उसके नजारे भी दर्शनीय हो गये हैं।

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

हर तरफ बारिश का पानी ही पानी

           वर्षों बाद मध्‍यप्रदेश की राजधानी बारिश के पानी से तरबतर हो गई है। लोगों को एक बार फिर वर्ष 2006 की बारिश याद आ गई। इस बारिश ने शहर को बाढ़ के दर्शन करा दिये थे। अब वर्ष 2012 में अगस्‍त महीने में हुई बारिश ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। हर तरफ पानी ही पानी दिख रहा है। मौसम खुशनुमा हो गया है, भोपाल की झील में पानी लबालब भर गया है। बड़े तालाब का जल स्‍तर 1666.10 फीट हो गया है। भदभदा का गेट खुलने के लिए मात्र 70 फीट पानी की दरकार है। राजधानी के हर वाशिंदे को भदभदा के गेट खुलने का इंतजार है, क्‍योंकि ऐसा मनोरम दृश्‍य बार-बार देखने को नहीं मिलता है। इससे पहले वर्ष 2006 में भदभदा के गेट खुल चुके हैं। 20 अगस्‍त को एक दिन में 2 इंज बारिश राजधानी में हुई है। बारिश से राजधानी पूरी तरह से प्रभावित हो गई है। ईद का माहौल भी पानी ने बिगाड़ा था, लेकिन फिर भी लोगों ने दिल खोलकर ईद मनाई। राजधानी में सबसे ज्‍यादा हालात नि‍चली बस्तियों के बिगड़ गये हैं। 
कई बस्तियां जलमग्‍न हो गई हैं। सड़कों पर 2 से 3 फीट पानी भर गया है। कई घरों में पानी घुस गया है, रास्‍ते जाम हो गये हैं, अंधरे ने दस्‍तक दे दी है। पानी के ओवर फ्लो ने पूरी व्‍यवस्‍था तहस-नहस कर दी है। प्रशासन की भूमिका एक बार फिर कटघरे में है। इससे साफ जाहिर हो गया है कि बारिश से पहले प्रशासन अपनी तैयारियां करने में नाकाम साबित हुआ है। मौसम विभाग ने फिर आशंका जाहिर की है कि बारिश अभी और होगी, जबकि अब राजधानी के वाशिंदे बारिश से राहत पाना चाहते हैं।
ईद की बधाईयां देते मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और फिल्‍म कलाकर रजामुराद





सोमवार, 20 अगस्त 2012

मप्र में युवतियों को जींस और टी-शर्ट न पहनने का फरमान

 
    आजकल मप्र में युवतियों के पहनावे पर बड़ा बबाल मचा हुआ है। युवतियों की छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं को रोकने का शिवराज सरकार की नजर में एक ही फार्मूला है कि युवतियां टी-शर्ट और जींस न पहने, बल्कि मर्यादा में रहे। इसको लेकर बहुत हल्‍ला मच रहा है। शिवराज सरकार के कैबिनेट मंत्री बाबूलाल गौर और कैलाश विजयवर्गीय समय-समय पर कह चुके हैं कि युवतियों को मर्यादा में रहना चाहिए और उन्‍हें ऐसे कपड़े नहीं पहनना चाहिए, जिससे युवक छेड़छाड़ करने को विवश हो जाये। अब इसी कड़ी में यातायात पुलिस के अधिकारियों ने भी अपनी महिला पुलिसकर्मियों के लिए फरमान जारी किया है कि वह जींस, टी-शर्ट पहनकर दफ्तर में न आये, इससे माहौल खराब होता है। वैसे तो महिला पुलिसकर्मियों को सप्‍ताह में छह दिन ड्रेस पहननी ही पड़ती है, लेकिन जिस दिन उन्‍हें छूट रहती है, वे अपने पसंद के कपड़े पहन सकती है, लेकिन यातायात पुलिस संचालनालय को युवतियों की यह आजादी पसंद नहीं है और वे उन्‍हें मर्यादा के अनुसार वेशभूषा पहनना चाहिए। फिलहाल तो महिला पुलिसकर्मी कुछ नहीं कह रही है, क्‍योंकि वे अनुशासन से बंधी हुई हैं। मप्र में युवतियों की ड्रेस को लेकर समय-समय पर विवाद गहराता रहता है। उनके पहनावे को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं। शहरों में अब युवतियां सलवार-कुर्ती एवं साड़ी में नजर नहीं आती है, बल्कि वे बाजार के अनुसार पहनावे में विश्‍वास कर रही हैं। भाजपा सरकार के रहनुमाओं को लगता है कि महिलाओं और युवतियों से छेड़छाड़ की घटनाएं वस्‍त्रों को लेकर होती हैं। इसलिए इन पर ही रोक लगाई जाये, फिलहाल तो इस विषय पर बहस चल पड़ी है, क्‍योंकि समाज अपने तर्क रख रहा है, युवतियां अपनी बात कह रही है तथा सरकार अपना राग आलाप रही है।

अब शुभचिंतक की किडनी से भी बच सकेगी जान

          उच्‍च न्‍यायालय जबलपुर की तरफ से समय-समय पर सरकार को फटकार तो मिलती रहती है पर हाईकोर्ट ने 17 अगस्‍त, 2012 को ऐसा दूरगामी फैसला सुनाया जो कि जाने कितने परिवारों में खुशियों की बयार आ गई है। इस फैसले के तहत अब किडनी के प्रत्‍यारोपण में आ रही कानूनी अड़चनों को आसानी से दूर किया जा सकेगा तथा कोई भी शुभचिंतक अपने मरीज को किडनी दान दे सकता है। यह शुभचिंतक इच्‍छा अनुसार किडनी का दान कर सकेगा। कोर्ट ने अपने आदेश में जिला मेडीकल बोर्ड को मरीज के हक में तत्‍काल प्रभाव से एनओसी प्रदान की एवं औपचारिकताएं पूर्ण करने के निर्देश दिये हैं। कोर्ट को यह मामला इसलिए सुनना पड़ा कि जबलपुर जिले के भेड़ाघाट पंचवटी निवासी और किडनी मरीज प्रतीक गुप्‍ता के मामले में आरएस झा की एकलपीठ ने सुनाया है, क्‍योंकि प्रतीक को उनका परिचित किडनी देने को तैयार था, लेकिन अस्‍पताल के कानून आनाकानी कर रहे थे। अब कोर्ट ने इस प्रक्रिया का खुलासा कर दिया है। इस मामले को अदालत में जोरदार तरीके से पैरवी करने वाली अधिवक्‍ता स्मिता अरोणा ने सुप्रीमकोर्ट के मामलों को भी कोर्ट में प्रस्‍तुत किया और किडनी मरीज को राहत देने के पक्ष में विभिन्‍न दलीले दी। उन्‍होंने कहा कि तमिलनाडु में एक परिवार के सदस्‍य का ब्‍लेडग्रुप मैच न करने की सूरत में किसी अन्‍य करीबी शुभचिंतक या रिश्‍तेदार की किडनी उसकी इच्‍छा होने पर प्रत्‍या‍रोपित की गई है। अंतत: कोर्ट ने वकील के तर्कों को स्‍वीकार किया एवं सरकारी वकील से सरकार का पक्ष जानना चाहा, तो उनकी भी सहमति मिली। इसके साथ ही अब मप्र में कोई भी शुभचिंतक किसी को अपनी किडनी दान कर सकेगा। निश्चित रूप से न्‍याय के इतिहास में यह अपने आप में एक अलहदा व मानवीयता पूर्ण फैसला सुनाया है, जो कि दूरगामी साबित होगा। इस फैसले से जाने कितने परिवारों की खुशिया लौट आई है। प्रतीक गुप्‍ता परिवार में तो खुशिया फिलहाल आ ही गई है, क्‍योंकि उनके घर के चिराग की दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं, जो कि डायलिसिस पर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है।

शनिवार, 11 अगस्त 2012

बहते पानी में फंसी जिंदगियां

           हर साल बारिश होती है और उसके बाद नदी-नाले उफान पर आते फिर सड़कों पर लबालब भरे पानी के बीच बस और चीप निकलने का साहस करते हैं जिसके फलस्‍वरूप वे फिर पानी में ही फंस जाते हैं। ऐसे समय जिंदगी कितनी असहाय हो जाती है, यह तो उन्‍हीं लोगों से समझा जा सकता है, जो मौत के निकट पहुंच जाते हैं। समझ से परे है कि हर साल बारिश के बाद भी सड़कों पर न तो जिला प्रशासन नजर आता है और न ही परिवहन विभाग की कोई भूमिका दिखती है। हर साल की तरह इस वर्ष भी पानी के भंवर जाल में लोगों के फंसने की कहानियां सामने आ रही हैं। 10 अगस्‍त, 2012 की रात्रि में जब पूरा देश कान्‍हा के जन्‍म उत्‍सव की धूम में डूबा हुआ था, तब मप्र के शिवपुरी जिले में महुअर नदी के तेज बहाव में एक निजी ट्रेवल्‍स की बस जा फंसी जिसमें 20 यात्री शामिल थे। बस पुल पर आगे बढ़ी ही थी कि गड्डे में जाकर फस गई और नदी का पानी बस की छत के करीब गुजर रहा था। जैसे-तैसे यात्री बस के छत पर पहुंचे और अपनी जान बचाने का प्रयास किया। इसके बाद शिवपुरी के कलेक्‍टर आरके जैन ने रेसक्‍यू टीम तैनात की तब जाकर यात्रियों को सुरक्षित निकाला जा सका। 
            इसी प्रकार एक अन्‍य घटना सतना जिले की जिगनहट नदी में 09 अगस्‍त को घटना सामने आई जहां पर रात में एक जीप नदी में पार करने के लिए उतरी और उतरते ही जीप गहरे पानी में समा गई। इस जीप में चार लोग सवार थे। यह लोग एक आदिवासी परिवार की महिला को प्रसूति के लिए जिला अस्‍पताल में भर्ती कराने के लिए ले जा रहे थे और रास्‍ते की नदी में जीप बुरी तरह से फंस गई। कहां जा रहा है कि जीप पुरानी थी और नदी में बाढ़ थी तथा पानी पुल के ऊपर बह रहा था जिसका अनुमान वाहन चालक नहीं लगा पाया और जैसे ही जीप पुल के बीच से गुजरी कि अचानक जीप बंद हो गई। बार-बार स्‍टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन स्‍टार्ट नहीं हो पाई। पुल पर लगातार पानी चढ़ता ही जा रहा था। इन चारों यात्रियों में से किसी के पास भी मोबाइल नहीं था। जैसे ही जीप बहने वाली थी कि गांव के लोगों ने अचानक उन लोगों को बचा लिया और जीप को जैसे-तैसे बाहर निकाला गया। निश्चित रूप से उन बहादुर लोगों को नमन जिन्‍होंने नदी में डूबने की कगार पर पहुंचे लोगों को बचा लिया। यहां पर यह सवाल अभी भी यथावत बना हुआ है कि आखिरकार हर साल बारिश होती है फिर भी सरकार के विभाग पहले से उन मार्गों को चिन्हित क्‍यों नहीं करते हैं, जहां पर नदी नाले सड़कों पर उफान मारते हैं और लोग बेमौत मारे जाते हैं। इस बारे में बार-बार नीति बनाने की बाते होती है, लेकिन उन पर कोई गौर नहीं करता है। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है और लगता है कि अभी भी चलता रहेगा। 
                                           ''जय हो मप्र की''

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

क्‍यों खुलती है प्राकृतिक आपदा पर ही नींद

          मध्‍यप्रदेश की जो भौगोलिक संरचना है उसमें हर साल प्राकृतिक आपदाएं अपना रौद्र रूप दिखा रही हैं। कभी बाढ़ की विभीषिका घेर लेती है और फिर ऐसा उल्‍टा चक्र चलता है कि महीनों बाढ़ से प्रभा‍वित आम आदमी पटरी पर आ ही नहीं पाता है। कभी ओले की मार पड़ती है, तो कभी फसलों को प्रकृति निगल लेती है। यह सिलसिला अनंत काल से चला आ रहा है पर फिर भी सरकार की नींद प्राकृतिका आपदा आने पर ही खुल रही है। मप्र में वर्ष 2006 में हुई बारिश में राजधानी को बाढ़ की चपेट में ले लिया था। नदियों ने कई गांवों को डुबो दिया था। इसके बाद सरकार ने कोई एक्‍शन-प्‍लान नहीं बनाया और न ही इस दिशा में विचार तक किया। प्रकृति की मार छह साल बाद फिर राज्‍य के वाशिंदे झेल रहे हैं। वर्ष 2012 अगस्‍त महीने की बारिश ने बाढ़ का विहंगम दृश्‍य उभार दिया है। अब सरकार अगले साल तक दक्ष रिस्‍पांस टीम बनाने की बात कर रही है, जबकि प्रदेश की बाढ़ से 23 मौते हो गई हैं, 245 पशुधन हानि हुई है, 1000 मकान और भवन टूटकर बिखर गये हैं, चम-चमाती सड़कों पर करोड़ों रूपये फूंकने के बाद प्रदेश के 16 जिलों में 85 सड़के और 06 राष्‍ट्रीय राजमार्गों में स्‍थान-स्‍थान पर गड्डे हो गये हैं। इसके साथ ही 04 पुल भी धरासाही हो गये हैं इसके अलावा एक दर्जन पु‍ल स्‍थान-स्‍थान से क्षतिग्रस्‍त हो गये हैं, जो कभी भी बड़ी घटना के साक्षी बन सकते हैं। 

          हर साल बारिश होती है पर बाढ़ का रौद्र रूप हर बार देखने को नहीं मिलता है इस साल मानसून ने अपना असली चेहरा फोकस कर दिया जिसकी वजह से प्रदेश के दो दर्जन से अधिक जिलों में बाढ़ ने न सिर्फ जन जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त किया, बल्कि प्रदेश के विकास को में भी विराम लगाया है। हालात इस कदर बिगड़ गये हैं कि रायसेन जिले में राहत कार्यों के लिए सेना बुलानी पड़ी। इसके साथ ही करीब एक दर्जन से अधिक जिलों में मुख्‍य मार्गों पर जगह-जगह चक्‍काजाम जैसी नौबत बन गई है, जो वाहन जहां खड़ा था वहीं 24 घंटे तक खड़ा रहा है। बाढ़ के बाद अब राहत कार्यों को लेकर सरकार ने अपनी सक्रियता दिखाई है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार बाढ़ पीडि़त क्षेत्रों का दौरा कर रहे है, उन्‍होंने अफसरों को भी मोर्चे पर तैनात कर दिया है। डे-टू-डे जिला प्रशासन से रिपोर्ट मंगाई जा रही है। अब हमेशा की तरह सीएम ने केंद्र से विशेष पैकेज की मांग भी कर डाली है पर इससे पहले कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया और सुरेश पचौरी ने पीएम से मिलकर मप्र को विशेष पैकेज देने के लिए ज्ञापन सौंप दिया है यानि बाढ़ और राहत अब कांग्रेस और भाजपा के लिए एक राजनीतिक मोहरा बन गया है, जबकि आम आदमी आज भी बाढ़ से राहत के लिए जदो-जहद कर रहा है। कई जगह पेड़ पर लोग रात गुजार रहे हैं। न तो खाने को रोटी मिल रही है और न ही पीने को शुद्व पानी। बस सड़कों पर बहते पानी से लोग रूबरू हो रहे हैं। इसके साथ ही सरकार ने प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए स्‍टेट डिजास्‍टर मैनजमेंट अथोरिटी गठित करने की मंशा जाहिर की है। यह फोर्स इमरजेंसी में काम करेंगा। आठ महीने में यह टीम तैयार हो जायेगी, जो कि सेना की तरह काम करेगी। चलिए बार-बार आ रही प्राकृतिक आपदा के बाद सरकार की नींद तो खुली है। बाढ़ से फिलहाल किसानों की फसलों को कोई खास नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन शहरों में बाजारों में व्‍यापारियों के चेहरे उतरे हुए हैं, क्‍योंकि उनका बाजार इन दिनों शांत है। बारिश में लोगों को अपने घरों तक कैद कर दिया है।  

बुधवार, 8 अगस्त 2012

दिग्विजय मध्‍यप्रदेश्‍ा की राजनीति नहीं करेंगे

            मध्‍यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह को लेकर हर समय कोई न कोई राजनीतिक कयासबाजी चलती ही रहती है। कभी उनके चिर-परचित विरोधी हमला बोलते हैं, तो कभी उनके निकट रहने वाले उनकी भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं। इसके बाद भी दिग्विजय सिंह चर्चा के घेरे से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। कोई आठ सालों से केंद्र की राजनीति में कदम-ताल कर रहे दिग्विजय सिंह बार-बार कह चुके हैं कि अब वे केंद्रीय राजनीति का हिस्‍सा बनकर रहेंगे, लेकिन उनकी मप्र में बढ़ती राजनीतिक रूचि से उनके विरोधी विश्‍वास नहीं करते हैं और समर्थक असमंजस्‍ा में रहते हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तहलका नामक पत्रिका के 15 अगस्‍त के अंक में साफ-तौर पर कहा है कि अब वे मप्र की राजनीति नहीं करेंगे। उन्‍होंने अपने साक्षात्‍कार में कहा है कि ''मैं एक बात साफ कर दूं कि मैं अब कभी भोपाल की राजनीति में नहीं लौटूगा, बल्कि केंद्र की राजनीति में ही रहूंगा। मप्र में राज्‍य स्‍तरीय नेता है, जो अपना काम कर रहे हैं।'' 
         दिग्विजय सिंह ने वर्ष 2003 में जब 10 साल का शासन करने के बाद पराजय का स्‍वाद चखा था तब कहा था कि वे दस साल तक कोई पद नहीं लेंगे। इसके बाद वे कांग्रेस महासचिव बने। जब-तब भोपाल की इंडियन कॉफी हाउस में पत्रकारों से गपशप करने पहुंचने वाले दिग्विजय सिंह ने अनौपचारिक चर्चा के बाद स्‍वीकार किया था कि उन्‍होंने चुनाव में पराजय के बाद जो कहा था उस पर अमल किया। संगठन में काम करने के लिए कभी भी मना नहीं किया था, बल्कि सत्‍ता का कोई पद लेने से इंकार किया था, जिस पर आज भी कायम हूं और न ही चुनाव लड़ा। दस साल का संयास का समय वर्ष 2013 में समाप्‍त हो रहा है उसके बाद आलाकमान कहेंगा, तो लोकसभा चुनाव लड़ूगा। निश्चित रूप से दिग्विजय सिंह के बयानों को लेकर भारी विवाद दिल्‍ली से लेकर भोपाल तक मचा रहता है। 
इन दिनों क्‍यों हैं विवादों में : 
         दिग्विजय सिंह इन दिनों इंदौर की राजनीति को लेकर विवादों में हैं। उन पर भाजपा सांसद सुमित्रा महाजन ने साफ-तौर पर आरोप लगाया है कि उद्योगमं‍त्री कैलाश विजयवर्गीय को बढ़ावा दिग्विजय सिंह सरकार में ही मिला है। इस बयान पर कांग्रेस सांसद सज्‍जन सिंह वर्मा ने सहमति जाहिर करते हुए यह तक कह दिया है कि दिग्विजय ने विजयवर्गीय को ताकतवर बनाया और हमें कमजोर किया। जिसका खामियाजा कांग्रेस पार्टी मालवांचल में उठा रही है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस और भाजपा की राजनीति के निशाने पर है उनके विरोधी उन्‍हें अब फिर से मप्र में सक्रिय होने पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो भाजपा भी समय का इंतजार कर रही है।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

फिर संकट में दिग्विजय सिंह मप्र में

देश की राजनीति में अपने बयानों से चर्चा में रहने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह इन दिनों में मप्र की राजनीति में एक फिर से भाजपा और कांग्रेस के निशाने पर आ गए है, इस बार उन पर शिव सरकार के केंबिनेट मंत्री कैलाशविजयवर्गीय को राजनीति में  बढावा देने का आरोप लगा है, मालवा की राजनीति में विजयवर्गीय एक ताकतवर राजनेता के रूप मे उभरे है तो उनके विरोधी भी कोई तीर चलाने में पीछे नहीं रहते है,बीते दिनों में इंदौर यात्रा पर कांग्रेस नेता दिग्जिवय सिंह ने अपनी वाचाल शैली का उपयोग कर पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद सुमित्रा महाजन पर वार करना चाहा पर श्रीमती महाजन ने पलटवार ऐसा किया कि दिग्विजय सिंह की बोलती बंद हो गई,श्रीमी महाजन ने  दिग्‍गी को कहा कि उनकी वजह से आज कैलाश विजयवर्गीय राजनेता के रूप में ताकतवर हो गए है इस पर कांग्रेस सांसद सज्‍जन सिंह वर्मा ने सुर में सुर मिलाया है,और कहा है कि दिग्जिवय सिंह ने मुख्‍यमंत्री रहते विजयवर्गीय को बढावा दिया और कांग्रेस को कमजारे किया, यह सिलसिला विजयवर्गीय के महापौर बनने के साथ ही शुरू हो गया था जो कि आज भी चल  रहा है, यूं तो दिग्जिवय सिंह आज भी कांगेस की राजनीति विवादों में बने हुए है,

फिर याद आई 2006 की बारिश

         मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 48 घंटों से लगातार हो रही बारिश ने एक बार फिर राजधानी वांशिदों को वर्ष 2006 की बाढ़ की याद दिला दी है। यूं तो अभी तक वैसे नजरे नहीं बने हैं, लेकिन जहां-तहां लबालब पानी ही पानी दिख रहा है। इस बारिश ने पूरे जनजीवन को अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया है। न तो बाजार खुल रहे हैं और न ही सरकारी कार्यालयों में कामकाज हो रहा है। हर तरफ बारिश ही बारिश की चर्चाएं हो रही हैं। इस सीजन में भोपाल में अभी तक 65.26 सेमी. बारिश हो चुकी है, जो सामान्‍य औसत बारिश से 109 सेमी है। कई इलाकों में डेढ़ से तीन फुट तक पानी भर गया है। पॉश कॉलोनियों के चौराहों पर पानी ही पानी है। बड़े तालाब में 1660.50 फुट तक जल स्‍तर पहुंच गया है। लगातार हो रही बारिश ने नगर निगम और जिला प्रशासन के इंतजामों पर पानी फेर दिया है। निचली बस्तियों में पानी प्रवेश कर गया है। यूं तो सरकारी और प्राइवेट स्‍कूलों में अवकाश घोषित कर दिया गया है, लेकिन फिर भी लगातार हो रही बारिश से आम जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। कई स्‍थानों से सड़क मार्ग का संपर्क टूट गया है। इससे पहले वर्ष 2006 में भोपाल में बाढ़ आई थी, तब लगातार बारिश ने रिकार्ड बनाया था, जो कि अभी तक टूटा नहीं है। 

प्रदेश में नर्मदा नदी खतरे के निशान से ऊपर : 
         लंबे समय बाद नर्मदा नदी होशंगाबाद जिले में खतरे के निशान से तीन फुट ज्‍यादा बह रही है। यहां पर सेना बुला ली गई है। 40 से अधिक गांवों में पानी भर गया है तथा 25 गांव खाली करने के आदेश जारी हो गये हैं। प्रदेश के करीब दो दर्जन से अधिक जिलों का राजधानी से संपर्क टूट गया है तथा आने-जाने के मार्ग पूरी तरह से बंद हैं। सूबे में बाढ़ अपना रौद्र रूप दिखा रही है। नदी-नाले उफान पर, अभी तक बारिश के कारण 21 लोगों की मौत हो गई है। पर्यटन स्‍थल पचमढ़ी में तो मानो बादल ही फट गये हैं। यहां पर 26 सेमी. बारिश हुई है। बारिश ने प्रदेश की पूरी आवोहवा बिगाड़ कर रख दी है। एक बार फिर प्रदेश की भाजपा सरकार  राहत कार्य शुरू करने का एलान कर चुकी है।